Wednesday, June 30, 2010

नक्सलवाद एक समस्या...?

क्या है नक्सलवाद-
1967 में सशस्त्र क्रांति के माध्यम से किसानों और मजदूरों को उनका हक दिलाने के लिए पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से आंदोलन की शुरूआत की गई थी । जिसे उसके स्थान के नाम पर नक्सलवाद आंदोलन कहा गया। इसके सिद्धांत मार्क्सवाद से प्रभावित थे, जबकि तरीके माओवाद थे ।
छत्तीसगढ़ दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला में 6 अप्रैल मंगलवार को हुए नक्सली हमले ने एक साथ 76 वीर सपूतों को छीन लिया.। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) 62 वीं बटालियन के थे जवान। इन 76 वीरों की माताओं की कोख सूनी हो गई। कई महिलाओं की मांग उजड़ गई।.कई ऐसी बहनें हैं जिनकी राखी के लिए अब कोई कलाई इंतज़ार नहीं करेगी.।दिल में देश सेवा का जज्बा लिए ।.इन वीर सूपतों की शहादत ने सभी की आंखे नम कर दी ।..कईयों को तो अब तक ये विश्वास ही नहीं हो रहा कि.उनका लाड़ला उन्हें छोड़कर बहुत दूर जा चुका है।
कैसे हुई चूक.. चूक का खुलासा-
सीआरपीएफ जवानों के नरसंहार के लए जिम्मेदार और उसमें लिप्त 6 नक्सलियों को पुलिस ने 23 मई को गिरफ्तार किया । इनमें से जनमिलिशिया दलम के कंपनी कमांडर बारसे लखमा ने मीडिया को ताड़मेटला हमले की अहम जानकारियों का खुलासा किया । ताड़मेटला घटना के दो दिन पूर्व सीआरपीएफ का एक वायरलेस सेट नक्सलियों के हाथ लग गया था। इस दौरान सीआरपीएफ के जवानों को यह निर्देश मिला था कि वायरलेस सेट प्राप्त किए बिना न लौटें।

नक्सली हमले में शहीद हुए जवानों को जगदलपुर में सैंकड़ों लोग श्रद्धांजली देने पहुंचे.।अपनों के ग़म से बेजार आंखों में बस एक ही सवाल था, आख़िर क्यों नक्सलवाद की बलिवेदी पर उनके सपूत बार-बार शहीद होते हैं। तिरंगें मे लिपटे शहीदों के शव.और रोते बिलखते परिजन सबसे शायद यही सवाल कर रहे हैं .देश सेवा का जज्बा उनके बच्चों को तो उनसे छीन ले गया.,लेकिन क्या सरकारें उनकी शहादत से सबक ले पाएंगी। शहीद जवानों के शवों का पोस्टमॉर्टम करने वाला व्यक्ति चंदुनाग भी हैरान-परेशान रहा। वो समझ नहीं पा रहा था कि कैसे नक्सलियों ने देश के 76 वीर जवानों को अपने खूनी खेल में निशाना बनाया.। ज्यादातर जवानों की मौत गोली लगने से हुई है। इस बारे में बोलते-बोलते चंदु की जुबान भी लड़खड़ा रही थी। एक साथ इतने जवानों का पोस्टमार्टम करने के बाद चंदु भी सहम सा गया था। उसकी जिंदगी में ऐसा मुश्किल भरा क्षण कभी नहीं आया।.शायद चंदु भी अब यही सोच रहा था.कि भगवान उसे ऐसा दिन कभी न दिखाए...जब उसे अपने हाथों से एक साथ अपने ही वीर सपूतों के शवों की चीर-फाड़ करना पड़े.।
दंतेवाड़ा के ताड़मेटला का वो जंगल.। जहां देश का सबसे बड़ा नक्सली हमला हुआ। अब भी वारदात की दहशत से सन्नाटे में डूबा हुआ है। यह जंगल की खामोशी को चीरती है,. तो सेना के जवानों के बूटों की आवाज। जो अपने साथियों की शहादत के बाद नक्सलियों की तलाश में जंगल-जंगल भटक रहे हैं। अब भी इस जंगल में खौफ के निशां मिल रहे हैं.।
छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद ये लगने लगा था कि प्रदेश में विकास की गंगा बहेगी। साथ ही इस प्रदेश की तरक्की की राह में कोई रोड़ा नहीं बनेगा। लेकिन सारी की सारी उम्मीदें ध्वस्त हो गई। प्रदेश की पैदाइश के साथ ही नक्सलियों ने इस जख्म पर जख्म दिए। यहां के विकास में नक्सलियों ने हमेशा रोड़े अटकाए। साथ ही अपने रास्ते में आने वाले लोगों को हमेशा के लिए हटा दिया। एक आंकड़े के मुताबिक बीते एक दशक में नक्सलियों ने करीब एक हजार बेकसूरों को मुखबिरी के शक में मौत के घाट उतार दिया। साल 2010 में अब तक 35 ग्रामीणों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। जबकि 2009 में 120 लोगों की मुखबिरी के नाम पर हत्या की गई। सन् 2008 में 143 लोगों ने नक्सलियों के हाथों अपनी जान गंवाई जबकि 2007 में 166 लोग मौत के घाट उतारे गए। 2005 में 126 लोग मुखबिरी के शक की भेंट चढ़े जबकि 2004 में 61 लोगों को नक्सलियों ने मौत के घाट उतारा। वहीं सन् 2003 में 36 लोगों ने अपनी जान गंवाई और 2002 में 29 लोगों की हत्या की गई। इससे पहले सन् 2001 में 23 और सन् 2000 में 20 बेकसूर मखबिरी के नाम पर नक्सलियों के हाथों कत्ल हुए।
पुलिस की माने तो ग्रामीण जब भी इलाके की तरक्की के लिए नक्सलियों का विरोध करते है नक्सली उनका हत्या कर देते है । मुखबिरी के शक में हमेशा ग्रामीणों की हत्या करके नक्सली अपनी दहशत और दबाव को कायम रखना चाहते हैं। सुरक्षा के लिहाज से ग्रामीणों को पुलिस की तरफ से मदद नही मिल पाती है शायद यही वजह है कि हर साल कई निर्दोष नक्सलियों के शिकार बन जाते है ।
अभी तक तो ये ही खबरे आ रहीं थीं कि पुलिस के जवान और डॉक्टर नक्सली इलाकों में जाने से कतरा रहे थे। लेकिन अब शिक्षक भी नक्सल प्रभावित इलाकों में जाने से डर रहे हैं। बस्तर में शिक्षाकर्मियों के खाली पड़े पदों को भरने के लिए महा परीक्षा का आयोजन किया था। लेकिन नक्सलियो के डर से अभ्यर्थी प्रमाणपत्रों की जांच तक करवाने नहीं पहुंचे। बस्तर के छात्रों को शिक्षकों की कमी से जूझना पड़ेगा। शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए व्यापमं ने महापरीक्षा का आयोजन किया था। जगदलपुर में वर्ग 1 और 2 के लिए कुल 1634 पदों के लिए विज्ञापन निकाला गया, जिनमें से 990 उपयुक्त अभियार्थी ही बस्तर को मिल पाए। लेकिन इनको भी जब बुलावा भेजा गया तो एक तिहाई अभ्यर्थी नक्सलियों के डर से प्रमाण पत्रों की जांच करवाने पहुंचे ही नहीं गये। जिले में वैसे ही विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की काफी कमी है। और सबसे बुरा हाल गणित और विज्ञान विषयों का है। ये नतीजे परेशान करने वाले हैं। लेकिन हकीकत ये ही है कि नक्सलियों के खौफ की वजह से चयनित उम्मीदवार जिला पंचायत पहुंचे ही नहीं।

दंतेवाड़ा नक्सली हमले चूक हई है,.इस बात को छत्तीसगढ़ पुलिस के मुखिया भी मानते हैं., लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि इस घटना के बाद भी नक्सलियों की रणनीति में कोई बदलाव नहीं होगा और ऑपरेशन जारी रहेगा।



2506 दंतेवाड़ा

गोलापल्ली में बुधवार को तीन जवान..शहीद हुए।.

कहां कहां हो रही है चूक....
बस्तर में नक्सलियो के ब्लैक आउट की समस्या निबटने के लिए सरकार ने एक साल के भीतर सामानांतर लाइन बिछाने की योजना बनाई थी। कांकेर से जगदलपुर तक नेशनल हाईवे के किनारे ये लाइन बिछाना था...लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी पैरलल लाइन की ये योजना पूरी नहीं हो सकी है।

महादेव घाट (दहसत, शहादत स्थली)
बीजापुर जिले में स्थित हैं महादेव घाट ,ये घाट अब सिर्फ घाट ही नहीं रह गया.।बल्कि जवानों की शहादत स्थली भी बन चुका है।.जिला मुख्यालय से महज 2 किमी की दूरी से महादेव घाट का इलाका शुरु हो जाता है.।लेकिन अब लोग इस घाट की तरफ आने से डरने लगे हैं.।क्योंकि नक्सली हमेशा इस इलाके में पुलिस को घेरने की तैयारी में लगे रहते है।.कई बार इनका शिकार आम आदमी को भी होना पड़ा है।.
बीजापुर का ये इलाका पुलिस के लिए लाइफ लाइन माना जाता है.।और यहां के सघन जंगलों का फायदा हमेशा नक्सली उठाते रहे हैं। अबतक ये इलाका 12 से ज्यादा जवानों की शहादत का गवाह बन चुका है।
अपनी काली करतूतों को अंजाम देने के लिए नक्सली महादेव घाट को सबसे मुनासिब जगह मानते हैं। ये ही वजह है कि अब इस घाट को मौत घाट काह जाने लगा है। ऐसे में यहां नक्सली वारदातों को रोकना..पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती है।

2005
नक्सलियों ने बेकसूर ग्रामीणों को निशाना बनाया । नक्सलियों ने 4 गांवों के 16 ग्रामीणों का अपहरण किया ... नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में इन ग्रामीणों का अपहरण किया था। अपहत लोगों की उम्र 18 से 22 साल के बीच रही। जिनमें से 6 लोगों को जान से मारने की धमकी भी दी। और बाकी लोगों को नक्सली अदालत में फैसला सुनाने की बात कही ।
2505
नक्सलियों ने 20 तारीख़ को अगवा किए गए 12 ग्रामीणों में से 3 की पुलिस की मुखबिरी करने के शक में हत्या कर दी है और तीन को रिहा कर दिया । बीजापुर में ही नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में ग्रामीणों के घरों में लूटपाट और तोड़फोड़ भी की।जिसके बाद ग्रामीणों को घर छोड़कर भैरमगढ़ राहत शिविर में शरण लेनी पड़ी।.
बीजापुर...28 मई को नक्सलियों ने चेरपाल गांव से तीन महिलाओं को अगवा कर लिया ।.नक्सल खौफ का आलम ये रहा कि परिजन इसकी रिपोर्ट तक थाने में दर्ज नहीं कराई

1605
राजनांदगांव के तेरेगांव इलाके में नक्सलियों ने सरपंच सहित 6 ग्रामीणों की गला रेतकर निर्मम हत्या कर दी। नक्सलियों ने ऊंचापुर और गट्टेगहन के पास ग्रामीणों को मारकर उनके शवों को फेंक दिए थे.।नक्सलियों को ग्रामीणों पर मुखबिरी का शक था।

बिस्फोटक बरामद
नक्सलियों ने लैंडमाइन के जरिए अब तक कई बड़े विस्फोटों को अंजाम दिया है.। नक्सलियों की इस कायराना हरकत को लेकर जवान ने मुस्तैदी दिखाई। जिसके चलते सुरक्षाबलों ने 11 मई को राष्ट्रीय राजमार्ग 221 के मनिकोंटा से 75 किलो का घातक विस्फोटक, 13 मई को मुकरम से 15 किलो विस्फोटक, बरामद किया। इसके साथ ही गोरखा सीआरपीएफ कैंप की नजदीकी सड़क पर ओपनिंग पार्टी ने 50 किलो का विस्फोटक बरामद किया। जो किसी भी बड़े एंटीलैंडमाइन व्हीकल के परखच्चे उड़ाने के लिए काफी था। 14 मई को कांकेर के मेढंकर नदी के पास से 9 बम बरामद किए गए बरामद लैंडमाइन और बम ये बताते हैं कि किस तरह नक्सली जवानों को निशाना बनाने को बेताब हैं. ।





2505 बीजापुर नक्सलियों ने ग्रामीणों को निशाना बनाया....नक्सलियों ने 20 तारीख़ को अगवा किए गए 12 ग्रामीणों में से 3 की पुलिस की मुखबिरी करने के शक में हत्या कर दी और तीन को रिहा कर दिया गया है, इसके अलावा 6 ग्रामीणों का अब तक पता नहीं चला। बीजापुर में ही नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में ग्रामीणों के घरों में लूटपाट और तोड़फोड़ भी की। जिसके बाद ग्रामीणों को घर छोड़कर भैरमगढ़ राहत शिविर में शरण लेनी पड़ी।. बीजापुर...28 मई को नक्सलियों ने चेरपाल गांव से तीन महिलाओं को अगवा कर लिया। .नक्सल खौफ का आलम ये था।..कि परिजन ने इसकी रिपोर्ट तक थाने में दर्ज नहीं कराई ।..
1605
राजनांदगांव यहां मानपुर से 25 किलोमीटर दूर तेरेगांव इलाके में नक्सलियों ने सरपंच सहित 6 ग्रामीणों की गला रेतकर निर्मम हत्या कर दी।. नक्सलियों ने ऊंचापुर और गट्टेगहन के पास ग्रामीणों को मारकर उनके शवों को फेंक दिया।. इसबार फिर नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में इनकी हत्या की।..


कैसे हुई चूक.. चूक का खुलासा-
सीआरपीएफ जवानों के नरसंहार के लए जिम्मेदार और उसमें लिप्त 6 नक्सलियों को पुलिस ने 23 मई को गिरफ्तार किया । इनमें से जनमिलिशिया दलम के कंपनी कमांडर बारसे लखमा ने मीडिया को ताड़मेटला हमले की अहम जानकारियों का खुलासा किया । ताड़मेटला घटना के दो दिन पूर्व सीआरपीएफ का एक वायरलेस सेट नक्सलियों के हाथ लग गया था। इस दौरान सीआरपीएफ के जवानों को यह निर्देश मिला था कि वायरलेस सेट प्राप्त किए बिना न लौटें ।


29 जून 2906

नक्सलियों का छत्तीसगढ़ को लहूलुहान करने का सिलसिला जारी...नारायणपुर से 36 किलोमीटर की दूरी पर धौड़ाई के पास महराबेड़ा में हुई मुठभेड़ में CRPF के 27 जवान शहीद हो गए।..इन शहीद जवानों में एक असिस्टेंट कमांडेंट भी शामिल ।..जवानओं में CRPF की 39वीं बटालियन 58 जवान औऱ 5 जवान जिला पुलिस बल SPO के थे.।
ये जवान सुबह 8 बजे के आसपास रोड ओपनिंग और गश्त के लिए गए थे । तक़रीबन दो बजे के आसपास जब ये महराबेड़ा पहुंचे तभी 150 से 200 नक्सलियों ने इन्हें घेर लिया।. कुछ जवान फ़ायरिंग में और कुछ एंबुश में फंसकर शहीद हो गए.।क्या है नक्सलवाद-
1967 में सशस्त्र क्रांति के माध्यम से किसानों और मजदूरों को उनका हक दिलाने के लिए पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से आंदोलन की शुरूआत की गई थी । जिसे उसके स्थान के नाम पर नक्सलवाद आंदोलन कहा गया। इसके सिद्धांत मार्क्सवाद से प्रभावित थे, जबकि तरीके माओवाद थे ।
छत्तीसगढ़ दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला में 6 अप्रैल मंगलवार को हुए नक्सली हमले ने एक साथ 76 वीर सपूतों को छीन लिया.। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) 62 वीं बटालियन के थे जवान। इन 76 वीरों की माताओं की कोख सूनी हो गई। कई महिलाओं की मांग उजड़ गई।.कई ऐसी बहनें हैं जिनकी राखी के लिए अब कोई कलाई इंतज़ार नहीं करेगी.।दिल में देश सेवा का जज्बा लिए ।.इन वीर सूपतों की शहादत ने सभी की आंखे नम कर दी ।..कईयों को तो अब तक ये विश्वास ही नहीं हो रहा कि.उनका लाड़ला उन्हें छोड़कर बहुत दूर जा चुका है।
कैसे हुई चूक.. चूक का खुलासा-
सीआरपीएफ जवानों के नरसंहार के लए जिम्मेदार और उसमें लिप्त 6 नक्सलियों को पुलिस ने 23 मई को गिरफ्तार किया । इनमें से जनमिलिशिया दलम के कंपनी कमांडर बारसे लखमा ने मीडिया को ताड़मेटला हमले की अहम जानकारियों का खुलासा किया । ताड़मेटला घटना के दो दिन पूर्व सीआरपीएफ का एक वायरलेस सेट नक्सलियों के हाथ लग गया था। इस दौरान सीआरपीएफ के जवानों को यह निर्देश मिला था कि वायरलेस सेट प्राप्त किए बिना न लौटें।

नक्सली हमले में शहीद हुए जवानों को जगदलपुर में सैंकड़ों लोग श्रद्धांजली देने पहुंचे.।अपनों के ग़म से बेजार आंखों में बस एक ही सवाल था, आख़िर क्यों नक्सलवाद की बलिवेदी पर उनके सपूत बार-बार शहीद होते हैं। तिरंगें मे लिपटे शहीदों के शव.और रोते बिलखते परिजन सबसे शायद यही सवाल कर रहे हैं .देश सेवा का जज्बा उनके बच्चों को तो उनसे छीन ले गया.,लेकिन क्या सरकारें उनकी शहादत से सबक ले पाएंगी। शहीद जवानों के शवों का पोस्टमॉर्टम करने वाला व्यक्ति चंदुनाग भी हैरान-परेशान रहा। वो समझ नहीं पा रहा था कि कैसे नक्सलियों ने देश के 76 वीर जवानों को अपने खूनी खेल में निशाना बनाया.। ज्यादातर जवानों की मौत गोली लगने से हुई है। इस बारे में बोलते-बोलते चंदु की जुबान भी लड़खड़ा रही थी। एक साथ इतने जवानों का पोस्टमार्टम करने के बाद चंदु भी सहम सा गया था। उसकी जिंदगी में ऐसा मुश्किल भरा क्षण कभी नहीं आया।.शायद चंदु भी अब यही सोच रहा था.कि भगवान उसे ऐसा दिन कभी न दिखाए...जब उसे अपने हाथों से एक साथ अपने ही वीर सपूतों के शवों की चीर-फाड़ करना पड़े.।
दंतेवाड़ा के ताड़मेटला का वो जंगल.। जहां देश का सबसे बड़ा नक्सली हमला हुआ। अब भी वारदात की दहशत से सन्नाटे में डूबा हुआ है। यह जंगल की खामोशी को चीरती है,. तो सेना के जवानों के बूटों की आवाज। जो अपने साथियों की शहादत के बाद नक्सलियों की तलाश में जंगल-जंगल भटक रहे हैं। अब भी इस जंगल में खौफ के निशां मिल रहे हैं.।
छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद ये लगने लगा था कि प्रदेश में विकास की गंगा बहेगी। साथ ही इस प्रदेश की तरक्की की राह में कोई रोड़ा नहीं बनेगा। लेकिन सारी की सारी उम्मीदें ध्वस्त हो गई। प्रदेश की पैदाइश के साथ ही नक्सलियों ने इस जख्म पर जख्म दिए। यहां के विकास में नक्सलियों ने हमेशा रोड़े अटकाए। साथ ही अपने रास्ते में आने वाले लोगों को हमेशा के लिए हटा दिया। एक आंकड़े के मुताबिक बीते एक दशक में नक्सलियों ने करीब एक हजार बेकसूरों को मुखबिरी के शक में मौत के घाट उतार दिया। साल 2010 में अब तक 35 ग्रामीणों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। जबकि 2009 में 120 लोगों की मुखबिरी के नाम पर हत्या की गई। सन् 2008 में 143 लोगों ने नक्सलियों के हाथों अपनी जान गंवाई जबकि 2007 में 166 लोग मौत के घाट उतारे गए। 2005 में 126 लोग मुखबिरी के शक की भेंट चढ़े जबकि 2004 में 61 लोगों को नक्सलियों ने मौत के घाट उतारा। वहीं सन् 2003 में 36 लोगों ने अपनी जान गंवाई और 2002 में 29 लोगों की हत्या की गई। इससे पहले सन् 2001 में 23 और सन् 2000 में 20 बेकसूर मखबिरी के नाम पर नक्सलियों के हाथों कत्ल हुए।
पुलिस की माने तो ग्रामीण जब भी इलाके की तरक्की के लिए नक्सलियों का विरोध करते है नक्सली उनका हत्या कर देते है । मुखबिरी के शक में हमेशा ग्रामीणों की हत्या करके नक्सली अपनी दहशत और दबाव को कायम रखना चाहते हैं। सुरक्षा के लिहाज से ग्रामीणों को पुलिस की तरफ से मदद नही मिल पाती है शायद यही वजह है कि हर साल कई निर्दोष नक्सलियों के शिकार बन जाते है ।
अभी तक तो ये ही खबरे आ रहीं थीं कि पुलिस के जवान और डॉक्टर नक्सली इलाकों में जाने से कतरा रहे थे। लेकिन अब शिक्षक भी नक्सल प्रभावित इलाकों में जाने से डर रहे हैं। बस्तर में शिक्षाकर्मियों के खाली पड़े पदों को भरने के लिए महा परीक्षा का आयोजन किया था। लेकिन नक्सलियो के डर से अभ्यर्थी प्रमाणपत्रों की जांच तक करवाने नहीं पहुंचे। बस्तर के छात्रों को शिक्षकों की कमी से जूझना पड़ेगा। शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए व्यापमं ने महापरीक्षा का आयोजन किया था। जगदलपुर में वर्ग 1 और 2 के लिए कुल 1634 पदों के लिए विज्ञापन निकाला गया, जिनमें से 990 उपयुक्त अभियार्थी ही बस्तर को मिल पाए। लेकिन इनको भी जब बुलावा भेजा गया तो एक तिहाई अभ्यर्थी नक्सलियों के डर से प्रमाण पत्रों की जांच करवाने पहुंचे ही नहीं गये। जिले में वैसे ही विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की काफी कमी है। और सबसे बुरा हाल गणित और विज्ञान विषयों का है। ये नतीजे परेशान करने वाले हैं। लेकिन हकीकत ये ही है कि नक्सलियों के खौफ की वजह से चयनित उम्मीदवार जिला पंचायत पहुंचे ही नहीं।

दंतेवाड़ा नक्सली हमले चूक हई है,.इस बात को छत्तीसगढ़ पुलिस के मुखिया भी मानते हैं., लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि इस घटना के बाद भी नक्सलियों की रणनीति में कोई बदलाव नहीं होगा और ऑपरेशन जारी रहेगा।



२५-06 दंतेवाड़ा

गोलापल्ली में बुधवार को तीन जवान..शहीद हुए।.

महादेव घाट (दहसत, शहादत स्थली)
बीजापुर जिले में स्थित हैं महादेव घाट ,ये घाट अब सिर्फ घाट ही नहीं रह गया.।बल्कि जवानों की शहादत स्थली भी बन चुका है।.जिला मुख्यालय से महज 2 किमी की दूरी से महादेव घाट का इलाका शुरु हो जाता है.।लेकिन अब लोग इस घाट की तरफ आने से डरने लगे हैं.।क्योंकि नक्सली हमेशा इस इलाके में पुलिस को घेरने की तैयारी में लगे रहते है।.कई बार इनका शिकार आम आदमी को भी होना पड़ा है।.
बीजापुर का ये इलाका पुलिस के लिए लाइफ लाइन माना जाता है.।और यहां के सघन जंगलों का फायदा हमेशा नक्सली उठाते रहे हैं। अबतक ये इलाका 12 से ज्यादा जवानों की शहादत का गवाह बन चुका है।
अपनी काली करतूतों को अंजाम देने के लिए नक्सली महादेव घाट को सबसे मुनासिब जगह मानते हैं। ये ही वजह है कि अब इस घाट को मौत घाट काह जाने लगा है। ऐसे में यहां नक्सली वारदातों को रोकना..पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती है।

२०-05
नक्सलियों ने बेकसूर ग्रामीणों को निशाना बनाया । नक्सलियों ने 4 गांवों के 16 ग्रामीणों का अपहरण किया ... नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में इन ग्रामीणों का अपहरण किया था। अपहत लोगों की उम्र 18 से 22 साल के बीच रही। जिनमें से 6 लोगों को जान से मारने की धमकी भी दी। और बाकी लोगों को नक्सली अदालत में फैसला सुनाने की बात कही ।
२५-05
नक्सलियों ने 20 तारीख़ को अगवा किए गए 12 ग्रामीणों में से 3 की पुलिस की मुखबिरी करने के शक में हत्या कर दी है और तीन को रिहा कर दिया । बीजापुर में ही नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में ग्रामीणों के घरों में लूटपाट और तोड़फोड़ भी की।जिसके बाद ग्रामीणों को घर छोड़कर भैरमगढ़ राहत शिविर में शरण लेनी पड़ी।.
बीजापुर...28 मई को नक्सलियों ने चेरपाल गांव से तीन महिलाओं को अगवा कर लिया ।.नक्सल खौफ का आलम ये रहा कि परिजन इसकी रिपोर्ट तक थाने में दर्ज नहीं कराई

१६-05
राजनांदगांव के तेरेगांव इलाके में नक्सलियों ने सरपंच सहित 6 ग्रामीणों की गला रेतकर निर्मम हत्या कर दी। नक्सलियों ने ऊंचापुर और गट्टेगहन के पास ग्रामीणों को मारकर उनके शवों को फेंक दिए थे.।नक्सलियों को ग्रामीणों पर मुखबिरी का शक था।

बिस्फोटक बरामद
नक्सलियों ने लैंडमाइन के जरिए अब तक कई बड़े विस्फोटों को अंजाम दिया है.। नक्सलियों की इस कायराना हरकत को लेकर जवान ने मुस्तैदी दिखाई। जिसके चलते सुरक्षाबलों ने 11 मई को राष्ट्रीय राजमार्ग 221 के मनिकोंटा से 75 किलो का घातक विस्फोटक, 13 मई को मुकरम से 15 किलो विस्फोटक, बरामद किया। इसके साथ ही गोरखा सीआरपीएफ कैंप की नजदीकी सड़क पर ओपनिंग पार्टी ने 50 किलो का विस्फोटक बरामद किया। जो किसी भी बड़े एंटीलैंडमाइन व्हीकल के परखच्चे उड़ाने के लिए काफी था। 14 मई को कांकेर के मेढंकर नदी के पास से 9 बम बरामद किए गए बरामद लैंडमाइन और बम ये बताते हैं कि किस तरह नक्सली जवानों को निशाना बनाने को बेताब हैं. ।





२५-05 बीजापुर नक्सलियों ने ग्रामीणों को निशाना बनाया....नक्सलियों ने 20 तारीख़ को अगवा किए गए 12 ग्रामीणों में से 3 की पुलिस की मुखबिरी करने के शक में हत्या कर दी और तीन को रिहा कर दिया गया है, इसके अलावा 6 ग्रामीणों का अब तक पता नहीं चला। बीजापुर में ही नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में ग्रामीणों के घरों में लूटपाट और तोड़फोड़ भी की। जिसके बाद ग्रामीणों को घर छोड़कर भैरमगढ़ राहत शिविर में शरण लेनी पड़ी।. बीजापुर...28 मई को नक्सलियों ने चेरपाल गांव से तीन महिलाओं को अगवा कर लिया। .नक्सल खौफ का आलम ये था।..कि परिजन ने इसकी रिपोर्ट तक थाने में दर्ज नहीं कराई ।..
1605
राजनांदगांव यहां मानपुर से 25 किलोमीटर दूर तेरेगांव इलाके में नक्सलियों ने सरपंच सहित 6 ग्रामीणों की गला रेतकर निर्मम हत्या कर दी।. नक्सलियों ने ऊंचापुर और गट्टेगहन के पास ग्रामीणों को मारकर उनके शवों को फेंक दिया।. इसबार फिर नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में इनकी हत्या की।..


कैसे हुई चूक.. चूक का खुलासा-
सीआरपीएफ जवानों के नरसंहार के लए जिम्मेदार और उसमें लिप्त 6 नक्सलियों को पुलिस ने 23 मई को गिरफ्तार किया । इनमें से जनमिलिशिया दलम के कंपनी कमांडर बारसे लखमा ने मीडिया को ताड़मेटला हमले की अहम जानकारियों का खुलासा किया । ताड़मेटला घटना के दो दिन पूर्व सीआरपीएफ का एक वायरलेस सेट नक्सलियों के हाथ लग गया था। इस दौरान सीआरपीएफ के जवानों को यह निर्देश मिला था कि वायरलेस सेट प्राप्त किए बिना न लौटें ।


29 जून 2906

नक्सलियों का छत्तीसगढ़ को लहूलुहान करने का सिलसिला जारी...नारायणपुर से 36 किलोमीटर की दूरी पर धौड़ाई के पास महराबेड़ा में हुई मुठभेड़ में CRPF के 27 जवान शहीद हो गए।..इन शहीद जवानों में एक असिस्टेंट कमांडेंट भी शामिल ।..जवानओं में CRPF की 39वीं बटालियन 58 जवान औऱ 5 जवान जिला पुलिस बल SPO के थे.।
ये जवान सुबह 8 बजे के आसपास रोड ओपनिंग और गश्त के लिए गए थे । तक़रीबन दो बजे के आसपास जब ये महराबेड़ा पहुंचे तभी 150 से 200 नक्सलियों ने इन्हें घेर लिया।। कुछ जवान फ़ायरिंग में और कुछ एंबुश में फंसकर शहीद हो गए.।

कहां कहां हो रही है चूक...... बस्तर में नक्सलियो के ब्लैक आउट की समस्या निबटने के लिए सरकार ने एक साल के भीतर सामानांतर लाइन बिछाने की योजना बनाई थी। कांकेर से जगदलपुर तक नेशनल हाईवे के किनारे ये लाइन बिछाना था...लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी पैरलल लाइन की ये योजना पूरी नहीं हो सकी है।

3 comments:

  1. ब्लॉग जगत में स्वागत है...अच्छा लिखे,खूब लिखें और बाकी को भी पढ़ें ...यही शुभकामनायें
    www.jugaali.blogspot.com

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  2. आंतकी कोई भी हो अपने आप को इंसान कहलाने का हकदार नहीं है !! और नाही जानवर !!! ये तो राक्षसों से भी गए गुजरे है !!

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  3. इस चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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