नक्सली मुद्दा आज नेता समाजसेवी मंत्री हर किसी के लिए पहचान बनाने का जरिया बन गया है। कोई नक्सली को अपना हितैशी और राष्ट्रहित चिंतक बताकर, एक बात तो है आज नक्सलियों के बारे में कुछ भी यदि बेबाकी से आप उनके पक्ष में बोलते हैं तो वो सुपरहिट जरूर होगा...क्यों कि विवादों भरी बात यदि निकलती है तो उस सभी को एतराज होगा ऐसे में यदि कोई नक्सली को अपना हितैशी बताए राष्ट्रहित के बारे में सोचेंगे ये तो नहीं हो सकता..जहां नक्सलियों के बारे में यदि कोई कहता है कि वो बदल सकते हैं तो ये इतना आसान नहीं, क्यों कि नक्सली आज आम आदमी को अपना निशाना बनाने लगे हैं...ये बात ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस (मिदिनापुर कोलकाता) के घटना की बात ले या फिर बीजापुर को निशाना बनाया ये दोनो हादसे बताते हैं कि नक्सली आज किसी को अपना निशाना बना सकते हैं...
बात तो ये थी पुरानी नक्सली मामले से जुड़ी लेकिन सवाल ये खड़ा हो रहा है कि जो लोग अपने ही लोगों को मार देने उन्हे काट देने में अपनी बहादुरी समझते हैं उन पर इतनी दरिया दिली क्यों की जा रही है। लोग कुछ भी बोल दे रहे हैं..बेतुकी बाते बोलने में लालू यादव जैसे कई महानुभाव हुए जिन्होने नक्सलियों हित के बारे में बात कही आज उन्ही को शक की निगाह से देखा जाए तो मेरे ख्याल गलत नहीं होगा...। इन्ही नक्सली हितैशियों में आजकल जो नाम सबसे उपर आ रहा है वो समाजसेवी स्वामी अग्निवेश का जो नक्सली औऱ सरकार के बीच शांति वार्ता की बात करते करते अब इनके बीच मध्यस्तता कराने चले हैं। अग्निवेश जी एक बात और कह रहे हैं कि यदि 12 लाख के इनामी खूंखार नक्सली को नहीं मारा गया होता तो नक्सलियों की बिचार धारा अबतक बदल गई होती । सवाल ये क्या सरकार बेवकूफ है जो किसी को पकड़ने का मारने वाले को 12 लाख रूपए का इनाम देगी। सोचिए जिसके सिर पर 12 लाख रूपए का इनाम हो उसे आप क्या समझ सकते है। सोचने वाली बात ये है कि जो देश की उन्नति में रूकावट बनते हैं जो आमलोगों को अपना निशाना बनाते हैं उनपर राजनीति क्यों की जाती है। आज स्वामी अग्निवेश और लालू यादव जैसे लोग ही देश के विकाश में आज रूकावट बन रहे हैं।
कमलेश पाण्डेय
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