Tuesday, November 30, 2010

दिमागी लंगडा राजा और लोकतंत्र

चुनाव आते ही सभी लोग अलग अलग दलों में अपना ठिकाना खोजने में लग जाते हैं !चेहरे वही पुराने बस पार्टी बदल जाती है,सिद्धांत बदल जाते हैं,बदल जाता है नजरिया ,कल तक जो अपने थे वही बेगाने हो जाते हैं!खैर छोडिये राजनीती है सब जायज है,
गठबंधन करके दल अपनी सरकार तो बना लेते हैं...लेकिन इस गठबंधन के बदले छोटे दलों के आगे सरकार नाक रगड़ती नजर आती है...वर्तमान सन्दर्भ में भी यही बात सच होती दिखाई दे रही है....प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सब कुछ देखते हुए भी अनजान बने रहे और अभी भी हालत में उनकी सुधार नहीं है...मतलब ए.राजा के मामले में वे चुप्पी साधे हुए है...शायद कारण यही है कि ए.राजा की पार्टी उनकी सरकार को साधे है.
वर्तमान में लोकतंत्र की दशा को व्यक्त करती एक कहानी याद आ गई सो उसे आप लोगों के सामने परोस रहा हूँ.
एक हंस-हंसिनी का बड़ा सुंदर जोड़ा था,दोनों में बड़ा प्रेम था!मजे से दिन कट रहे थे !एक दिन दोनों ने नीलगगन में सैर करने की सोची,दोनों सैर करते करते काफी दूर निकल गए!रात हो गई थी सोचा रात यही गुजार कर सुबह चलते है!एक बरगद का पेड़ दिखाई दिया,दोनों वहां पहुचे!उस बरगद के पेड़ पर एक उल्लू रहता था !हंस ने उल्लू से रात गुजारने की बात कही,उल्लू ने अनुमति दे दी!कहा कोई बात नही!सुबह जब हंस-हंसिनी उठ कर जाने लगे तब उल्लू ने हंसिनी को पकड़ लिया, कहा अब हंसीं मेरी है!हंस ने बड़ी विनती की लेकिन उल्लू नही माना,अब हंस ने राजा के दरबार में गुहार लगायी!राजा ने उल्लू को बुलाया,कहा उल्लू,हंसिनी हमेशा हंस की होती है,उल्लू की कभी नही हो सकती !ये जोड़ा बेमेल है!उल्लू ने कहा -हंसिनी मेरी है,यदि आपने ऐसा निर्णय नही दिया तो मै किले की प्राचीर पर बैठ कर आपके काले कारनामों का चिटठा खोल दूंगा !अब राजा डर गया!उसका निर्णय बदल गया,उसने कहा-हंस,अब हंसिनी उल्लू की है!तुम घर जाओ!हंस रोते हुए उदास मन से जाने लगा !अब उल्लू भी रो रहा था!हंस ने पूंछा-तुम क्यों रो रहे हो?मेरी हंसिनी मुझसे छीन गई है,मेरे रोने का कारण तो समझ में आता है,लेकिन तुम क्यों रो रहे हो?उल्लू बोला- में लोक तंत्र की दशा पर रो रहा हूँ,एक सिरफिरे के कारण राजा ने अपना निर्णय बदल दिया!एक धमकी से राजा ने अन्याय को जीता दिया!भ्रष्टाचार को बढ़ावा इन धमकियों के कारण ही शायद मिल रहा है...क्या होगा इस देश का?इसलिए मै रो रहा हूँ!यही हाल है पूरे देश में,अब जनता को सोचना है अगली सरकार उन्हें कैसी बनानी है!
..........................जवाबों की आस में
- कृष्ण कुमार द्विवेदी
छात्र(मा.रा.प.विवि,भोपाल)

Wednesday, August 11, 2010

बेकार की जद्दोजहद.......

नक्सली मुद्दा आज नेता समाजसेवी मंत्री हर किसी के लिए पहचान बनाने का जरिया बन गया है। कोई नक्सली को अपना हितैशी और राष्ट्रहित चिंतक बताकर, एक बात तो है आज नक्सलियों के बारे में कुछ भी यदि बेबाकी से आप उनके पक्ष में बोलते हैं तो वो सुपरहिट जरूर होगा...क्यों कि विवादों भरी बात यदि निकलती है तो उस सभी को एतराज होगा ऐसे में यदि कोई नक्सली को अपना हितैशी बताए राष्ट्रहित के बारे में सोचेंगे ये तो नहीं हो सकता..जहां नक्सलियों के बारे में यदि कोई कहता है कि वो बदल सकते हैं तो ये इतना आसान नहीं, क्यों कि नक्सली आज आम आदमी को अपना निशाना बनाने लगे हैं...ये बात ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस (मिदिनापुर कोलकाता) के घटना की बात ले या फिर बीजापुर को निशाना बनाया ये दोनो हादसे बताते हैं कि नक्सली आज किसी को अपना निशाना बना सकते हैं...
बात तो ये थी पुरानी नक्सली मामले से जुड़ी लेकिन सवाल ये खड़ा हो रहा है कि जो लोग अपने ही लोगों को मार देने उन्हे काट देने में अपनी बहादुरी समझते हैं उन पर इतनी दरिया दिली क्यों की जा रही है। लोग कुछ भी बोल दे रहे हैं..बेतुकी बाते बोलने में लालू यादव जैसे कई महानुभाव हुए जिन्होने नक्सलियों हित के बारे में बात कही आज उन्ही को शक की निगाह से देखा जाए तो मेरे ख्याल गलत नहीं होगा...। इन्ही नक्सली हितैशियों में आजकल जो नाम सबसे उपर आ रहा है वो समाजसेवी स्वामी अग्निवेश का जो नक्सली औऱ सरकार के बीच शांति वार्ता की बात करते करते अब इनके बीच मध्यस्तता कराने चले हैं। अग्निवेश जी एक बात और कह रहे हैं कि यदि 12 लाख के इनामी खूंखार नक्सली को नहीं मारा गया होता तो नक्सलियों की बिचार धारा अबतक बदल गई होती । सवाल ये क्या सरकार बेवकूफ है जो किसी को पकड़ने का मारने वाले को 12 लाख रूपए का इनाम देगी। सोचिए जिसके सिर पर 12 लाख रूपए का इनाम हो उसे आप क्या समझ सकते है। सोचने वाली बात ये है कि जो देश की उन्नति में रूकावट बनते हैं जो आमलोगों को अपना निशाना बनाते हैं उनपर राजनीति क्यों की जाती है। आज स्वामी अग्निवेश और लालू यादव जैसे लोग ही देश के विकाश में आज रूकावट बन रहे हैं।
कमलेश पाण्डेय

Wednesday, June 30, 2010

नक्सलवाद एक समस्या...?

क्या है नक्सलवाद-
1967 में सशस्त्र क्रांति के माध्यम से किसानों और मजदूरों को उनका हक दिलाने के लिए पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से आंदोलन की शुरूआत की गई थी । जिसे उसके स्थान के नाम पर नक्सलवाद आंदोलन कहा गया। इसके सिद्धांत मार्क्सवाद से प्रभावित थे, जबकि तरीके माओवाद थे ।
छत्तीसगढ़ दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला में 6 अप्रैल मंगलवार को हुए नक्सली हमले ने एक साथ 76 वीर सपूतों को छीन लिया.। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) 62 वीं बटालियन के थे जवान। इन 76 वीरों की माताओं की कोख सूनी हो गई। कई महिलाओं की मांग उजड़ गई।.कई ऐसी बहनें हैं जिनकी राखी के लिए अब कोई कलाई इंतज़ार नहीं करेगी.।दिल में देश सेवा का जज्बा लिए ।.इन वीर सूपतों की शहादत ने सभी की आंखे नम कर दी ।..कईयों को तो अब तक ये विश्वास ही नहीं हो रहा कि.उनका लाड़ला उन्हें छोड़कर बहुत दूर जा चुका है।
कैसे हुई चूक.. चूक का खुलासा-
सीआरपीएफ जवानों के नरसंहार के लए जिम्मेदार और उसमें लिप्त 6 नक्सलियों को पुलिस ने 23 मई को गिरफ्तार किया । इनमें से जनमिलिशिया दलम के कंपनी कमांडर बारसे लखमा ने मीडिया को ताड़मेटला हमले की अहम जानकारियों का खुलासा किया । ताड़मेटला घटना के दो दिन पूर्व सीआरपीएफ का एक वायरलेस सेट नक्सलियों के हाथ लग गया था। इस दौरान सीआरपीएफ के जवानों को यह निर्देश मिला था कि वायरलेस सेट प्राप्त किए बिना न लौटें।

नक्सली हमले में शहीद हुए जवानों को जगदलपुर में सैंकड़ों लोग श्रद्धांजली देने पहुंचे.।अपनों के ग़म से बेजार आंखों में बस एक ही सवाल था, आख़िर क्यों नक्सलवाद की बलिवेदी पर उनके सपूत बार-बार शहीद होते हैं। तिरंगें मे लिपटे शहीदों के शव.और रोते बिलखते परिजन सबसे शायद यही सवाल कर रहे हैं .देश सेवा का जज्बा उनके बच्चों को तो उनसे छीन ले गया.,लेकिन क्या सरकारें उनकी शहादत से सबक ले पाएंगी। शहीद जवानों के शवों का पोस्टमॉर्टम करने वाला व्यक्ति चंदुनाग भी हैरान-परेशान रहा। वो समझ नहीं पा रहा था कि कैसे नक्सलियों ने देश के 76 वीर जवानों को अपने खूनी खेल में निशाना बनाया.। ज्यादातर जवानों की मौत गोली लगने से हुई है। इस बारे में बोलते-बोलते चंदु की जुबान भी लड़खड़ा रही थी। एक साथ इतने जवानों का पोस्टमार्टम करने के बाद चंदु भी सहम सा गया था। उसकी जिंदगी में ऐसा मुश्किल भरा क्षण कभी नहीं आया।.शायद चंदु भी अब यही सोच रहा था.कि भगवान उसे ऐसा दिन कभी न दिखाए...जब उसे अपने हाथों से एक साथ अपने ही वीर सपूतों के शवों की चीर-फाड़ करना पड़े.।
दंतेवाड़ा के ताड़मेटला का वो जंगल.। जहां देश का सबसे बड़ा नक्सली हमला हुआ। अब भी वारदात की दहशत से सन्नाटे में डूबा हुआ है। यह जंगल की खामोशी को चीरती है,. तो सेना के जवानों के बूटों की आवाज। जो अपने साथियों की शहादत के बाद नक्सलियों की तलाश में जंगल-जंगल भटक रहे हैं। अब भी इस जंगल में खौफ के निशां मिल रहे हैं.।
छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद ये लगने लगा था कि प्रदेश में विकास की गंगा बहेगी। साथ ही इस प्रदेश की तरक्की की राह में कोई रोड़ा नहीं बनेगा। लेकिन सारी की सारी उम्मीदें ध्वस्त हो गई। प्रदेश की पैदाइश के साथ ही नक्सलियों ने इस जख्म पर जख्म दिए। यहां के विकास में नक्सलियों ने हमेशा रोड़े अटकाए। साथ ही अपने रास्ते में आने वाले लोगों को हमेशा के लिए हटा दिया। एक आंकड़े के मुताबिक बीते एक दशक में नक्सलियों ने करीब एक हजार बेकसूरों को मुखबिरी के शक में मौत के घाट उतार दिया। साल 2010 में अब तक 35 ग्रामीणों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। जबकि 2009 में 120 लोगों की मुखबिरी के नाम पर हत्या की गई। सन् 2008 में 143 लोगों ने नक्सलियों के हाथों अपनी जान गंवाई जबकि 2007 में 166 लोग मौत के घाट उतारे गए। 2005 में 126 लोग मुखबिरी के शक की भेंट चढ़े जबकि 2004 में 61 लोगों को नक्सलियों ने मौत के घाट उतारा। वहीं सन् 2003 में 36 लोगों ने अपनी जान गंवाई और 2002 में 29 लोगों की हत्या की गई। इससे पहले सन् 2001 में 23 और सन् 2000 में 20 बेकसूर मखबिरी के नाम पर नक्सलियों के हाथों कत्ल हुए।
पुलिस की माने तो ग्रामीण जब भी इलाके की तरक्की के लिए नक्सलियों का विरोध करते है नक्सली उनका हत्या कर देते है । मुखबिरी के शक में हमेशा ग्रामीणों की हत्या करके नक्सली अपनी दहशत और दबाव को कायम रखना चाहते हैं। सुरक्षा के लिहाज से ग्रामीणों को पुलिस की तरफ से मदद नही मिल पाती है शायद यही वजह है कि हर साल कई निर्दोष नक्सलियों के शिकार बन जाते है ।
अभी तक तो ये ही खबरे आ रहीं थीं कि पुलिस के जवान और डॉक्टर नक्सली इलाकों में जाने से कतरा रहे थे। लेकिन अब शिक्षक भी नक्सल प्रभावित इलाकों में जाने से डर रहे हैं। बस्तर में शिक्षाकर्मियों के खाली पड़े पदों को भरने के लिए महा परीक्षा का आयोजन किया था। लेकिन नक्सलियो के डर से अभ्यर्थी प्रमाणपत्रों की जांच तक करवाने नहीं पहुंचे। बस्तर के छात्रों को शिक्षकों की कमी से जूझना पड़ेगा। शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए व्यापमं ने महापरीक्षा का आयोजन किया था। जगदलपुर में वर्ग 1 और 2 के लिए कुल 1634 पदों के लिए विज्ञापन निकाला गया, जिनमें से 990 उपयुक्त अभियार्थी ही बस्तर को मिल पाए। लेकिन इनको भी जब बुलावा भेजा गया तो एक तिहाई अभ्यर्थी नक्सलियों के डर से प्रमाण पत्रों की जांच करवाने पहुंचे ही नहीं गये। जिले में वैसे ही विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की काफी कमी है। और सबसे बुरा हाल गणित और विज्ञान विषयों का है। ये नतीजे परेशान करने वाले हैं। लेकिन हकीकत ये ही है कि नक्सलियों के खौफ की वजह से चयनित उम्मीदवार जिला पंचायत पहुंचे ही नहीं।

दंतेवाड़ा नक्सली हमले चूक हई है,.इस बात को छत्तीसगढ़ पुलिस के मुखिया भी मानते हैं., लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि इस घटना के बाद भी नक्सलियों की रणनीति में कोई बदलाव नहीं होगा और ऑपरेशन जारी रहेगा।



2506 दंतेवाड़ा

गोलापल्ली में बुधवार को तीन जवान..शहीद हुए।.

कहां कहां हो रही है चूक....
बस्तर में नक्सलियो के ब्लैक आउट की समस्या निबटने के लिए सरकार ने एक साल के भीतर सामानांतर लाइन बिछाने की योजना बनाई थी। कांकेर से जगदलपुर तक नेशनल हाईवे के किनारे ये लाइन बिछाना था...लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी पैरलल लाइन की ये योजना पूरी नहीं हो सकी है।

महादेव घाट (दहसत, शहादत स्थली)
बीजापुर जिले में स्थित हैं महादेव घाट ,ये घाट अब सिर्फ घाट ही नहीं रह गया.।बल्कि जवानों की शहादत स्थली भी बन चुका है।.जिला मुख्यालय से महज 2 किमी की दूरी से महादेव घाट का इलाका शुरु हो जाता है.।लेकिन अब लोग इस घाट की तरफ आने से डरने लगे हैं.।क्योंकि नक्सली हमेशा इस इलाके में पुलिस को घेरने की तैयारी में लगे रहते है।.कई बार इनका शिकार आम आदमी को भी होना पड़ा है।.
बीजापुर का ये इलाका पुलिस के लिए लाइफ लाइन माना जाता है.।और यहां के सघन जंगलों का फायदा हमेशा नक्सली उठाते रहे हैं। अबतक ये इलाका 12 से ज्यादा जवानों की शहादत का गवाह बन चुका है।
अपनी काली करतूतों को अंजाम देने के लिए नक्सली महादेव घाट को सबसे मुनासिब जगह मानते हैं। ये ही वजह है कि अब इस घाट को मौत घाट काह जाने लगा है। ऐसे में यहां नक्सली वारदातों को रोकना..पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती है।

2005
नक्सलियों ने बेकसूर ग्रामीणों को निशाना बनाया । नक्सलियों ने 4 गांवों के 16 ग्रामीणों का अपहरण किया ... नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में इन ग्रामीणों का अपहरण किया था। अपहत लोगों की उम्र 18 से 22 साल के बीच रही। जिनमें से 6 लोगों को जान से मारने की धमकी भी दी। और बाकी लोगों को नक्सली अदालत में फैसला सुनाने की बात कही ।
2505
नक्सलियों ने 20 तारीख़ को अगवा किए गए 12 ग्रामीणों में से 3 की पुलिस की मुखबिरी करने के शक में हत्या कर दी है और तीन को रिहा कर दिया । बीजापुर में ही नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में ग्रामीणों के घरों में लूटपाट और तोड़फोड़ भी की।जिसके बाद ग्रामीणों को घर छोड़कर भैरमगढ़ राहत शिविर में शरण लेनी पड़ी।.
बीजापुर...28 मई को नक्सलियों ने चेरपाल गांव से तीन महिलाओं को अगवा कर लिया ।.नक्सल खौफ का आलम ये रहा कि परिजन इसकी रिपोर्ट तक थाने में दर्ज नहीं कराई

1605
राजनांदगांव के तेरेगांव इलाके में नक्सलियों ने सरपंच सहित 6 ग्रामीणों की गला रेतकर निर्मम हत्या कर दी। नक्सलियों ने ऊंचापुर और गट्टेगहन के पास ग्रामीणों को मारकर उनके शवों को फेंक दिए थे.।नक्सलियों को ग्रामीणों पर मुखबिरी का शक था।

बिस्फोटक बरामद
नक्सलियों ने लैंडमाइन के जरिए अब तक कई बड़े विस्फोटों को अंजाम दिया है.। नक्सलियों की इस कायराना हरकत को लेकर जवान ने मुस्तैदी दिखाई। जिसके चलते सुरक्षाबलों ने 11 मई को राष्ट्रीय राजमार्ग 221 के मनिकोंटा से 75 किलो का घातक विस्फोटक, 13 मई को मुकरम से 15 किलो विस्फोटक, बरामद किया। इसके साथ ही गोरखा सीआरपीएफ कैंप की नजदीकी सड़क पर ओपनिंग पार्टी ने 50 किलो का विस्फोटक बरामद किया। जो किसी भी बड़े एंटीलैंडमाइन व्हीकल के परखच्चे उड़ाने के लिए काफी था। 14 मई को कांकेर के मेढंकर नदी के पास से 9 बम बरामद किए गए बरामद लैंडमाइन और बम ये बताते हैं कि किस तरह नक्सली जवानों को निशाना बनाने को बेताब हैं. ।





2505 बीजापुर नक्सलियों ने ग्रामीणों को निशाना बनाया....नक्सलियों ने 20 तारीख़ को अगवा किए गए 12 ग्रामीणों में से 3 की पुलिस की मुखबिरी करने के शक में हत्या कर दी और तीन को रिहा कर दिया गया है, इसके अलावा 6 ग्रामीणों का अब तक पता नहीं चला। बीजापुर में ही नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में ग्रामीणों के घरों में लूटपाट और तोड़फोड़ भी की। जिसके बाद ग्रामीणों को घर छोड़कर भैरमगढ़ राहत शिविर में शरण लेनी पड़ी।. बीजापुर...28 मई को नक्सलियों ने चेरपाल गांव से तीन महिलाओं को अगवा कर लिया। .नक्सल खौफ का आलम ये था।..कि परिजन ने इसकी रिपोर्ट तक थाने में दर्ज नहीं कराई ।..
1605
राजनांदगांव यहां मानपुर से 25 किलोमीटर दूर तेरेगांव इलाके में नक्सलियों ने सरपंच सहित 6 ग्रामीणों की गला रेतकर निर्मम हत्या कर दी।. नक्सलियों ने ऊंचापुर और गट्टेगहन के पास ग्रामीणों को मारकर उनके शवों को फेंक दिया।. इसबार फिर नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में इनकी हत्या की।..


कैसे हुई चूक.. चूक का खुलासा-
सीआरपीएफ जवानों के नरसंहार के लए जिम्मेदार और उसमें लिप्त 6 नक्सलियों को पुलिस ने 23 मई को गिरफ्तार किया । इनमें से जनमिलिशिया दलम के कंपनी कमांडर बारसे लखमा ने मीडिया को ताड़मेटला हमले की अहम जानकारियों का खुलासा किया । ताड़मेटला घटना के दो दिन पूर्व सीआरपीएफ का एक वायरलेस सेट नक्सलियों के हाथ लग गया था। इस दौरान सीआरपीएफ के जवानों को यह निर्देश मिला था कि वायरलेस सेट प्राप्त किए बिना न लौटें ।


29 जून 2906

नक्सलियों का छत्तीसगढ़ को लहूलुहान करने का सिलसिला जारी...नारायणपुर से 36 किलोमीटर की दूरी पर धौड़ाई के पास महराबेड़ा में हुई मुठभेड़ में CRPF के 27 जवान शहीद हो गए।..इन शहीद जवानों में एक असिस्टेंट कमांडेंट भी शामिल ।..जवानओं में CRPF की 39वीं बटालियन 58 जवान औऱ 5 जवान जिला पुलिस बल SPO के थे.।
ये जवान सुबह 8 बजे के आसपास रोड ओपनिंग और गश्त के लिए गए थे । तक़रीबन दो बजे के आसपास जब ये महराबेड़ा पहुंचे तभी 150 से 200 नक्सलियों ने इन्हें घेर लिया।. कुछ जवान फ़ायरिंग में और कुछ एंबुश में फंसकर शहीद हो गए.।क्या है नक्सलवाद-
1967 में सशस्त्र क्रांति के माध्यम से किसानों और मजदूरों को उनका हक दिलाने के लिए पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से आंदोलन की शुरूआत की गई थी । जिसे उसके स्थान के नाम पर नक्सलवाद आंदोलन कहा गया। इसके सिद्धांत मार्क्सवाद से प्रभावित थे, जबकि तरीके माओवाद थे ।
छत्तीसगढ़ दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला में 6 अप्रैल मंगलवार को हुए नक्सली हमले ने एक साथ 76 वीर सपूतों को छीन लिया.। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) 62 वीं बटालियन के थे जवान। इन 76 वीरों की माताओं की कोख सूनी हो गई। कई महिलाओं की मांग उजड़ गई।.कई ऐसी बहनें हैं जिनकी राखी के लिए अब कोई कलाई इंतज़ार नहीं करेगी.।दिल में देश सेवा का जज्बा लिए ।.इन वीर सूपतों की शहादत ने सभी की आंखे नम कर दी ।..कईयों को तो अब तक ये विश्वास ही नहीं हो रहा कि.उनका लाड़ला उन्हें छोड़कर बहुत दूर जा चुका है।
कैसे हुई चूक.. चूक का खुलासा-
सीआरपीएफ जवानों के नरसंहार के लए जिम्मेदार और उसमें लिप्त 6 नक्सलियों को पुलिस ने 23 मई को गिरफ्तार किया । इनमें से जनमिलिशिया दलम के कंपनी कमांडर बारसे लखमा ने मीडिया को ताड़मेटला हमले की अहम जानकारियों का खुलासा किया । ताड़मेटला घटना के दो दिन पूर्व सीआरपीएफ का एक वायरलेस सेट नक्सलियों के हाथ लग गया था। इस दौरान सीआरपीएफ के जवानों को यह निर्देश मिला था कि वायरलेस सेट प्राप्त किए बिना न लौटें।

नक्सली हमले में शहीद हुए जवानों को जगदलपुर में सैंकड़ों लोग श्रद्धांजली देने पहुंचे.।अपनों के ग़म से बेजार आंखों में बस एक ही सवाल था, आख़िर क्यों नक्सलवाद की बलिवेदी पर उनके सपूत बार-बार शहीद होते हैं। तिरंगें मे लिपटे शहीदों के शव.और रोते बिलखते परिजन सबसे शायद यही सवाल कर रहे हैं .देश सेवा का जज्बा उनके बच्चों को तो उनसे छीन ले गया.,लेकिन क्या सरकारें उनकी शहादत से सबक ले पाएंगी। शहीद जवानों के शवों का पोस्टमॉर्टम करने वाला व्यक्ति चंदुनाग भी हैरान-परेशान रहा। वो समझ नहीं पा रहा था कि कैसे नक्सलियों ने देश के 76 वीर जवानों को अपने खूनी खेल में निशाना बनाया.। ज्यादातर जवानों की मौत गोली लगने से हुई है। इस बारे में बोलते-बोलते चंदु की जुबान भी लड़खड़ा रही थी। एक साथ इतने जवानों का पोस्टमार्टम करने के बाद चंदु भी सहम सा गया था। उसकी जिंदगी में ऐसा मुश्किल भरा क्षण कभी नहीं आया।.शायद चंदु भी अब यही सोच रहा था.कि भगवान उसे ऐसा दिन कभी न दिखाए...जब उसे अपने हाथों से एक साथ अपने ही वीर सपूतों के शवों की चीर-फाड़ करना पड़े.।
दंतेवाड़ा के ताड़मेटला का वो जंगल.। जहां देश का सबसे बड़ा नक्सली हमला हुआ। अब भी वारदात की दहशत से सन्नाटे में डूबा हुआ है। यह जंगल की खामोशी को चीरती है,. तो सेना के जवानों के बूटों की आवाज। जो अपने साथियों की शहादत के बाद नक्सलियों की तलाश में जंगल-जंगल भटक रहे हैं। अब भी इस जंगल में खौफ के निशां मिल रहे हैं.।
छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद ये लगने लगा था कि प्रदेश में विकास की गंगा बहेगी। साथ ही इस प्रदेश की तरक्की की राह में कोई रोड़ा नहीं बनेगा। लेकिन सारी की सारी उम्मीदें ध्वस्त हो गई। प्रदेश की पैदाइश के साथ ही नक्सलियों ने इस जख्म पर जख्म दिए। यहां के विकास में नक्सलियों ने हमेशा रोड़े अटकाए। साथ ही अपने रास्ते में आने वाले लोगों को हमेशा के लिए हटा दिया। एक आंकड़े के मुताबिक बीते एक दशक में नक्सलियों ने करीब एक हजार बेकसूरों को मुखबिरी के शक में मौत के घाट उतार दिया। साल 2010 में अब तक 35 ग्रामीणों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। जबकि 2009 में 120 लोगों की मुखबिरी के नाम पर हत्या की गई। सन् 2008 में 143 लोगों ने नक्सलियों के हाथों अपनी जान गंवाई जबकि 2007 में 166 लोग मौत के घाट उतारे गए। 2005 में 126 लोग मुखबिरी के शक की भेंट चढ़े जबकि 2004 में 61 लोगों को नक्सलियों ने मौत के घाट उतारा। वहीं सन् 2003 में 36 लोगों ने अपनी जान गंवाई और 2002 में 29 लोगों की हत्या की गई। इससे पहले सन् 2001 में 23 और सन् 2000 में 20 बेकसूर मखबिरी के नाम पर नक्सलियों के हाथों कत्ल हुए।
पुलिस की माने तो ग्रामीण जब भी इलाके की तरक्की के लिए नक्सलियों का विरोध करते है नक्सली उनका हत्या कर देते है । मुखबिरी के शक में हमेशा ग्रामीणों की हत्या करके नक्सली अपनी दहशत और दबाव को कायम रखना चाहते हैं। सुरक्षा के लिहाज से ग्रामीणों को पुलिस की तरफ से मदद नही मिल पाती है शायद यही वजह है कि हर साल कई निर्दोष नक्सलियों के शिकार बन जाते है ।
अभी तक तो ये ही खबरे आ रहीं थीं कि पुलिस के जवान और डॉक्टर नक्सली इलाकों में जाने से कतरा रहे थे। लेकिन अब शिक्षक भी नक्सल प्रभावित इलाकों में जाने से डर रहे हैं। बस्तर में शिक्षाकर्मियों के खाली पड़े पदों को भरने के लिए महा परीक्षा का आयोजन किया था। लेकिन नक्सलियो के डर से अभ्यर्थी प्रमाणपत्रों की जांच तक करवाने नहीं पहुंचे। बस्तर के छात्रों को शिक्षकों की कमी से जूझना पड़ेगा। शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए व्यापमं ने महापरीक्षा का आयोजन किया था। जगदलपुर में वर्ग 1 और 2 के लिए कुल 1634 पदों के लिए विज्ञापन निकाला गया, जिनमें से 990 उपयुक्त अभियार्थी ही बस्तर को मिल पाए। लेकिन इनको भी जब बुलावा भेजा गया तो एक तिहाई अभ्यर्थी नक्सलियों के डर से प्रमाण पत्रों की जांच करवाने पहुंचे ही नहीं गये। जिले में वैसे ही विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की काफी कमी है। और सबसे बुरा हाल गणित और विज्ञान विषयों का है। ये नतीजे परेशान करने वाले हैं। लेकिन हकीकत ये ही है कि नक्सलियों के खौफ की वजह से चयनित उम्मीदवार जिला पंचायत पहुंचे ही नहीं।

दंतेवाड़ा नक्सली हमले चूक हई है,.इस बात को छत्तीसगढ़ पुलिस के मुखिया भी मानते हैं., लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि इस घटना के बाद भी नक्सलियों की रणनीति में कोई बदलाव नहीं होगा और ऑपरेशन जारी रहेगा।



२५-06 दंतेवाड़ा

गोलापल्ली में बुधवार को तीन जवान..शहीद हुए।.

महादेव घाट (दहसत, शहादत स्थली)
बीजापुर जिले में स्थित हैं महादेव घाट ,ये घाट अब सिर्फ घाट ही नहीं रह गया.।बल्कि जवानों की शहादत स्थली भी बन चुका है।.जिला मुख्यालय से महज 2 किमी की दूरी से महादेव घाट का इलाका शुरु हो जाता है.।लेकिन अब लोग इस घाट की तरफ आने से डरने लगे हैं.।क्योंकि नक्सली हमेशा इस इलाके में पुलिस को घेरने की तैयारी में लगे रहते है।.कई बार इनका शिकार आम आदमी को भी होना पड़ा है।.
बीजापुर का ये इलाका पुलिस के लिए लाइफ लाइन माना जाता है.।और यहां के सघन जंगलों का फायदा हमेशा नक्सली उठाते रहे हैं। अबतक ये इलाका 12 से ज्यादा जवानों की शहादत का गवाह बन चुका है।
अपनी काली करतूतों को अंजाम देने के लिए नक्सली महादेव घाट को सबसे मुनासिब जगह मानते हैं। ये ही वजह है कि अब इस घाट को मौत घाट काह जाने लगा है। ऐसे में यहां नक्सली वारदातों को रोकना..पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती है।

२०-05
नक्सलियों ने बेकसूर ग्रामीणों को निशाना बनाया । नक्सलियों ने 4 गांवों के 16 ग्रामीणों का अपहरण किया ... नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में इन ग्रामीणों का अपहरण किया था। अपहत लोगों की उम्र 18 से 22 साल के बीच रही। जिनमें से 6 लोगों को जान से मारने की धमकी भी दी। और बाकी लोगों को नक्सली अदालत में फैसला सुनाने की बात कही ।
२५-05
नक्सलियों ने 20 तारीख़ को अगवा किए गए 12 ग्रामीणों में से 3 की पुलिस की मुखबिरी करने के शक में हत्या कर दी है और तीन को रिहा कर दिया । बीजापुर में ही नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में ग्रामीणों के घरों में लूटपाट और तोड़फोड़ भी की।जिसके बाद ग्रामीणों को घर छोड़कर भैरमगढ़ राहत शिविर में शरण लेनी पड़ी।.
बीजापुर...28 मई को नक्सलियों ने चेरपाल गांव से तीन महिलाओं को अगवा कर लिया ।.नक्सल खौफ का आलम ये रहा कि परिजन इसकी रिपोर्ट तक थाने में दर्ज नहीं कराई

१६-05
राजनांदगांव के तेरेगांव इलाके में नक्सलियों ने सरपंच सहित 6 ग्रामीणों की गला रेतकर निर्मम हत्या कर दी। नक्सलियों ने ऊंचापुर और गट्टेगहन के पास ग्रामीणों को मारकर उनके शवों को फेंक दिए थे.।नक्सलियों को ग्रामीणों पर मुखबिरी का शक था।

बिस्फोटक बरामद
नक्सलियों ने लैंडमाइन के जरिए अब तक कई बड़े विस्फोटों को अंजाम दिया है.। नक्सलियों की इस कायराना हरकत को लेकर जवान ने मुस्तैदी दिखाई। जिसके चलते सुरक्षाबलों ने 11 मई को राष्ट्रीय राजमार्ग 221 के मनिकोंटा से 75 किलो का घातक विस्फोटक, 13 मई को मुकरम से 15 किलो विस्फोटक, बरामद किया। इसके साथ ही गोरखा सीआरपीएफ कैंप की नजदीकी सड़क पर ओपनिंग पार्टी ने 50 किलो का विस्फोटक बरामद किया। जो किसी भी बड़े एंटीलैंडमाइन व्हीकल के परखच्चे उड़ाने के लिए काफी था। 14 मई को कांकेर के मेढंकर नदी के पास से 9 बम बरामद किए गए बरामद लैंडमाइन और बम ये बताते हैं कि किस तरह नक्सली जवानों को निशाना बनाने को बेताब हैं. ।





२५-05 बीजापुर नक्सलियों ने ग्रामीणों को निशाना बनाया....नक्सलियों ने 20 तारीख़ को अगवा किए गए 12 ग्रामीणों में से 3 की पुलिस की मुखबिरी करने के शक में हत्या कर दी और तीन को रिहा कर दिया गया है, इसके अलावा 6 ग्रामीणों का अब तक पता नहीं चला। बीजापुर में ही नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में ग्रामीणों के घरों में लूटपाट और तोड़फोड़ भी की। जिसके बाद ग्रामीणों को घर छोड़कर भैरमगढ़ राहत शिविर में शरण लेनी पड़ी।. बीजापुर...28 मई को नक्सलियों ने चेरपाल गांव से तीन महिलाओं को अगवा कर लिया। .नक्सल खौफ का आलम ये था।..कि परिजन ने इसकी रिपोर्ट तक थाने में दर्ज नहीं कराई ।..
1605
राजनांदगांव यहां मानपुर से 25 किलोमीटर दूर तेरेगांव इलाके में नक्सलियों ने सरपंच सहित 6 ग्रामीणों की गला रेतकर निर्मम हत्या कर दी।. नक्सलियों ने ऊंचापुर और गट्टेगहन के पास ग्रामीणों को मारकर उनके शवों को फेंक दिया।. इसबार फिर नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में इनकी हत्या की।..


कैसे हुई चूक.. चूक का खुलासा-
सीआरपीएफ जवानों के नरसंहार के लए जिम्मेदार और उसमें लिप्त 6 नक्सलियों को पुलिस ने 23 मई को गिरफ्तार किया । इनमें से जनमिलिशिया दलम के कंपनी कमांडर बारसे लखमा ने मीडिया को ताड़मेटला हमले की अहम जानकारियों का खुलासा किया । ताड़मेटला घटना के दो दिन पूर्व सीआरपीएफ का एक वायरलेस सेट नक्सलियों के हाथ लग गया था। इस दौरान सीआरपीएफ के जवानों को यह निर्देश मिला था कि वायरलेस सेट प्राप्त किए बिना न लौटें ।


29 जून 2906

नक्सलियों का छत्तीसगढ़ को लहूलुहान करने का सिलसिला जारी...नारायणपुर से 36 किलोमीटर की दूरी पर धौड़ाई के पास महराबेड़ा में हुई मुठभेड़ में CRPF के 27 जवान शहीद हो गए।..इन शहीद जवानों में एक असिस्टेंट कमांडेंट भी शामिल ।..जवानओं में CRPF की 39वीं बटालियन 58 जवान औऱ 5 जवान जिला पुलिस बल SPO के थे.।
ये जवान सुबह 8 बजे के आसपास रोड ओपनिंग और गश्त के लिए गए थे । तक़रीबन दो बजे के आसपास जब ये महराबेड़ा पहुंचे तभी 150 से 200 नक्सलियों ने इन्हें घेर लिया।। कुछ जवान फ़ायरिंग में और कुछ एंबुश में फंसकर शहीद हो गए.।

कहां कहां हो रही है चूक...... बस्तर में नक्सलियो के ब्लैक आउट की समस्या निबटने के लिए सरकार ने एक साल के भीतर सामानांतर लाइन बिछाने की योजना बनाई थी। कांकेर से जगदलपुर तक नेशनल हाईवे के किनारे ये लाइन बिछाना था...लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी पैरलल लाइन की ये योजना पूरी नहीं हो सकी है।

Saturday, April 10, 2010

अपनो को काटने में बहादुरी समझते है...नक्सली ?

नक्सलवाद, नक्सल आज की एक बड़ी समस्या के रूप में हमारे सामने आया है छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के चिंतलनार की घटना ने तो हद ही कर दिया।जहां नक्सलियों ने ७६ जवानों को उड़ा, दिया मूली गाजर की तरह उन्हे काट दिया। इसे आप क्या समझेगें , क्या नक्सली एक उस बिगड़ैल बंदर की भांति हो गये हैं जो अपना जिसमें उसका बसेरा है उसे उजाड़ देता है। जैसे एक बिगड़ैल बंदर अपनी उस हरी भरी बगिया को उजाड़ कर बीरान बना देता है। आज नक्सली भी ठीक उसी तरह अपने ही लोगों को गाजर मूली की तरह काट देने में बहादुरी समझते हैं। ये किसे मार रहे हैं किसके खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं क्या करना चाहते हैं इससे इनका लक्ष्य है वे क्या दिखाना चाहते हैं देश की रक्षा करने वाले वीर सिपाहियों को अपना निशाना क्यों बना रहे हैं, असहाय लोगों की निर्मम हत्या कर देने उन्हें थोड़ा सा भी गुरेज नहीं होता॥ वे ऐसा कर क्या जताना चाहते हैं इससे उन्हे क्या हासिल हो जाएगा नक्सलियों यह कृत्य सोचनीय है ? लेकिन क्या नक्सली ऐसा तो नहीं सोचते

Thursday, March 18, 2010

पथ से बिछड़ते लोग, समाज, मीडिया.....?

ये बहुत अजीब बात है कि आज हमारा समाज, मीडिया और सरकार किसी को सही दिशा में ले जाने का ध्यान नहीं है। लोगों का ध्यान ऐसी तरफ क्यों जा रहा है जहां से सिर्फ और सिर्फ हमारा नुकसान है समाज का नुकसान है। आज समाज के रक्षक ही भक्षक बन रहे हैं बड़ा ही सोचनीय बिषय है। इसके पीछे जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि हम खुद हैं।मैं बात कर रहा हूं कहने के लिए एक छोटी सी बात है लेकिन है बहुत बड़ी। बात है उन बच्चों की बच्चों के भविष्य की जो राजनीति का शिकार हो रहे हैं। जहां बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं वहां के बच्चों को स्कूल ले जाने की बात नहीं की जाती, उन्हे स्कूल की ओर कैसे ले जाया जाय इसकी बात नहीं की जाती, बल्कि बात ये की जाती है कि स्कूल में अब खाना नहीं दिया जाता खाना खराब दिया जाता है, खाने की क्वालिटी खराब है, बच्चों को मिलने वाले वजीफे को लोग बीच में रोक ले रहे हैं। ऐसी तमाम बातें की फालतू की जाती हैं,

अरे ध्यान उस तरफ दीजिए जहां से लोंगों का बिकास हो बच्चें पढ़े आगे बढ़े देश का बिकास हो फालतू की बातों में क्यों ध्यान दिया जा रहा है.....